हिंदू दर्शन विश्व के प्राचीनतम व विशालतम दर्शनों में एक है। इसकी विशाल धारा की प्रवाह और लचीलापन ही सम्पूर्ण विश्व जनमानस को आकर्षित करती रही है, देश-काल गत सापेक्षता ने ही इसे प्रतिकूल परिस्थितियों में भी अक्षुण्ण रखा है।हिंदू धर्म व दर्शन ने अपने को समय-समय पर प्रोन्नत किया है जिसके सूत्र हम वैदिक काल के अनंतर उपनिषद् काल में पाते है और यह परम्परा मध्यकाल के संत कवियों तक देखी जा सकती है।
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आज का दौर भारत और हिंदू धर्म के लिये चुनौती पूर्ण है, हिंदू धर्म के लिए एक प्रकार से अस्तित्व संकट जैसा है क्योंकि यह अपना मूल स्वभाव सहिष्णुता को दिन-प्रतिदिन क्षरित कर रहा। जब हम हिंदू धर्म कह रहे तो इसका स्पष्ट अर्थ है कि हम आप अर्थात् इसके अनुयायी। क्या किसी कट्टरपंथी और हममें कोई विशेष अंतर रह गया है? नहीं।क्या हम अपने आर्ष वाक्यों और ग्रंथो के मार्गों का अनुसरण कर रहे या केवल राजनैतिक हिंदू बन रहे? ऐसे अनेक यक्ष प्रश्न है जो अस्तित्व संकट को इंगित करते हैं।
इन सवालों का जवाब देने के लिए हम धर्म के सत्य भाव सत्य,प्रेम,करुणा और सौहार्द के सूत्र पर मानव समाज को एकीकृत करने का संकल्प लेते हैं।

सत्य धर्म संवाद एक प्रकल्प है मनुष्य से मनुष्य को जोड़ने का।यह ग़ैर राजनैतिक संगठन है जिसका कार्य धर्माधिकारियों के साथ बंधुत्व और करुणापरक संदेश देना है।आज के दौर में जब हिंदू धर्म का संदिग्धार्थ किया जा रहा है, इस परिस्थिति में मनुष्यता की रक्षा के लिए, भारत भूमि के रक्षा के लिए और हिंदुइज्म की रक्षा के लिए; जो अपने कोमल स्वभाव के लिए सम्पूर्ण विश्व में पूज्य था किंतु दुर्भाग्य से वर्तमान में इसके कुछ प्रस्तोताओं द्वारा ग़लत व हिंसापूर्ण व्याख्या से हिंदूफोबिया जैसा माहौल हो रहा, और जाति विहीन समाज हेतु कृतसंकल्पित हैं। यह प्रकल्प हिंदू धर्म के कारुणिक आचार्यों द्वारा ही प्रारम्भ की गई है।
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हमारे संकल्प वाक्य हैं-

- घृणा पर प्रेम की जीत
- सभी मनुष्य एक हैं
- सब धर्मों में शांति है
- जात पात विहीन सामाज
हमारे यहाँ अर्थात् भारत भूमि में यह धारणा रही है कि निर्गुण-निराकार ईश्वर जब पृथ्वी पर घृणा,वैमनस्य,हिंसा व व्याभिचार आदि बढ़ता है तो वही सगुण-साकार रूप में अवतरित होता है एवं पृथ्वी के समस्याओं का उपशमन कर सांसारिक व्यवस्था को सुदृढ़ करता है।क्या हम उस ईश्वर के भक्त होने के नाते अथवा अंश होने के नाते; जैसा कि गीता में योगेश्वर कृष्ण ने कहा है - ममैवांशो जीवलोके जीवभूत: सनातन: अर्थात् मेरा ही अंश है जीव, कर्तव्य नहीं बनता कि सबसे प्रेम कर अपने स्वभाव को प्राप्त हों। प्रेम हमारा मौलिक स्वभाव है, पौराणिक कथाओं में जितने भी निशाचर अथवा आततायी हैं सब घृणा ही फैलाते है किंतु भगवान स्वयं प्रेम रूप हैं और अंतत: प्रेम की ही विजय होती है। इस दृष्टि से हम कंश, रावण आदि के कथानक को देख सकते हैं।
केले के पौधे जैसा समाज में जातीय संरचना है और मनुष्य तब तक नहीं आपसी सौहार्द बना सकता जब तक जाति जाती नहीं। हम ऐसे संतो के जीवनदर्शन से प्रेरणा लेकर जाति विहीन समाज का संकल्प करते हैं।

नारद भक्ति सूत्र में देवर्षि भक्ति के सम्बंध में कहते हैं कि ‘सा परम प्रेम स्वरूपा’ और मध्यकाल के प्रसिद्ध राम भक्त कवि गोस्वामी तुलसीदास जी अपने प्रसिद्ध ग्रंथ रामचरितमानस में श्रीराम को क्या प्रिय है लिखते हैं- रामहि केवल प्रेमु पिआरा। जानि लेउ जो जाननिहारा।। अर्थात् जो यह जान गया कि राम जी को बस प्रेम ही प्यारा है यह जानने मात्र से ही व्यक्ति ज्ञानी हो जाता है। ऐसे असंख्य उद्धरणों से हिंदू दर्शन के ग्रंथ पूरित हैं।

भारत की वर्तमान स्थिति चिंताजनक है, आप सबके सहयोग से भविष्य के विपदा से बचा जा सकता है; मनुष्यता का संकट, इसलिये हिंदू धर्मगुरुओं को आगे आना होगा। सत्य, प्रेम, करुणा पर आधारित हिंदू दर्शन का प्रचार-प्रसार और घृणा को परास्त करने हेतु कटिबद्ध हैं। आप हमारे इस आंदोलन से जुड़े और मानवीय उत्कर्ष में सहयोगी बने।
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